बनालो सहकारी खेती
( तर्ज : गेला हरी कुण्या गांवा ? )
बनालो सहकारी खेती ,
पकावो मिलके भलीभाँति
करो फिर धनकी उत्पत्ति ।
बढेगी छाती ,
देश की उन्नति ! ॥ टेक ॥
देश ये किसान का कहते ,
मगर इसमें तो सभी रहते
सभी ही काम - धाम करते ,
बखतपर वो खाना चाहते
इसमें शक हि नहीं होता ,
चाहिये अनाज को भरती
बढेगी छाती ,
देश की उन्नति ।। १ ।।
बढई कारागिर भी हैं ,
बुनकर - लुहार दर्जी है
घडाने बेलदार चाहिये ,
मोची - कुम्भार भी तो हैं
वैद्य और वकील गुरुजी भी ,
सभी को रहती है नाती
बढेगी छाती ,
देश की उन्नति ॥ २ ॥
अकेले खेति करोगे तुम ,
बल नहीं तो रो लोगे तुम ।
चारहुँ भाई मिलोगे तुम ,
पडेगा नहीं जरा भी कम ॥
इसे शासन भी मदद देता ,
गरज जब किसान को होती ।
बढेगी छाती ,
देश की उन्नति ॥३ ॥
खेती सब मिलकर करना ,
मुनाफा सब मिलकर लेना ।
सच्चा हिसाब भी रखना ,
जमीं की देखभाल सिखना ।।
तुकड्यादास कहे मित्रो !
चलेगी अब तो यही नीति ।
बढेगी छाती ,
देश की उन्नति ॥४ ॥
गोंदिया ; दि . २० - ९ -६२
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